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Surat ul Fatiha in Hindi with Arabic text الرحمن الرحيم

सुरा फातिहा तर्जमा और तफसीर आयत 2 तफही मुल कुरान मौलाना सैयद अबुल अला मौदुदी और तफसीर इब्न कसीर।

Surat ul Fatiha Ayat 2 in Hindi Translation and Tafseer Tafhimul Quran .

Surat ul Fatiha अल रहमान अल रहीम الرحمن الرحيم रहमान अल-रहीम की विशेषता को यहां सूरह के बीच में एक निरंतर आयत के रूप में दोहराया जा रहा है। इसमें दया और करुणा के सभी अर्थ, सभी स्थितियाँ और सभी आयाम समाहित हैं। अल रहमान रहीम दोनो सिफात इकट्ठी होने का मानी यह है के उस की रहमत ठाठे मारते होए समंदर के मानिंद है , और उस की रहमत में दवाम भी है वह एक दरिया की तरह रवां दवां है। अल्लाह ताला की रहमत की यह दोनो शाने ब एक समय मौजूद है। 

Surah Fatiha Ayat 2 with Arabic text الرحمن الرحيم hindi translation

          الرَّحۡمٰنِ الرَّحِیۡمِ [۲]

          الرَّحۡمٰنِ الرَّحِیۡمِ [۲]

         रहमान और रहीम है 

[पिछली]             سورة الفاتحة        [अगली]

सुरा फातिहा तफसीर हिन्दी सैयद मौलाना अबुल अला मौदुदी ।

हाशिया-4 इन्सान की ख़ुसूसियत है कि जब कोई चीज़ उसकी निगाह में बहुत ज़्यादा होती है, तो वो मुबालग़े (अतिश्योक्ति) के सीग़ों में उसको बयान करता है। अगर एक मुबालग़े का लफ़्ज़ बोलकर वो महसूस करता है कि उस चीज़ की फ़रावानी का हक़ अदा नहीं हुआ, तो फिर वो उसी मानी का एक और लफ़्ज़ बोलता है, ताकि वो कमी पूरी हो जाए जो उसके नज़दीक मुबालग़े में रह गई है। अल्लाह की तारीफ़ (प्रशंसा) में रहमान (अत्यंत करुणामय) का लफ़्ज़ इस्तेमाल करने के बाद फिर रहीम (अत्यंत दयावान) का लफ़्ज़ बढ़ा देने में भी यही बात छिपी हुई है। रहमान अरबी ज़बान में बड़े मुबालग़े का सीग़ा है, लेकिन अल्लाह की रहमत (दयालुता) और मेहरबानी अपनी मख़लूक़ पर इतनी ज़्यादा है, इतनी फैली हुई है, ऐसी बेहदो-हिसाब है कि उसके बयान में बड़े से बड़ा मुबालग़े का लफ़्ज़ बोलकर भी जी नहीं भरता। इसलिये उसकी मिसाल ऐसी है जैसे हम किसी शख़्स की फ़य्याज़ी (दानशीलता) के बयान में सख़ी (दाता) का लफ़्ज़ बोलकर जब तिश्नगी (यानी कुछ कमी) महसूस करते हैं तो उस पर दाता का लफ़्ज़ बढ़ा देते हैं। रंग की तारीफ़ (प्रशंसा) में रब गोरा को काफ़ी नहीं पाते तो उस पर चिट्टे का लफ़्ज़ और बढ़ा देते हैं। लम्बे क़द के ज़िक्र में जब लम्बा कहने से तसल्ली नहीं होती तो उसके बाद तड़ंगा भी कहते हैं।

Surah 1 Ayat 2 in Hindi some Highlights points अल्लाह की तारीफ मे रहमान और रहीम दोनों साथ का क्या मतलब है ।

अल्लाह की तारीफ़ (प्रशंसा) में रहमान (अत्यंत करुणामय) का लफ़्ज़ इस्तेमाल करने के बाद फिर रहीम (अत्यंत दयावान) का लफ़्ज़ बढ़ा देने में भी यही बात छिपी हुई है। रहमान अरबी ज़बान में बड़े मुबालग़े का सीग़ा है, लेकिन अल्लाह की रहमत (दयालुता) और मेहरबानी अपनी मख़लूक़ पर इतनी ज़्यादा है, इतनी फैली हुई है, ऐसी बेहदो-हिसाब है कि उसके बयान में बड़े से बड़ा मुबालग़े का लफ़्ज़ बोलकर भी जी नहीं भरता।

अल रहमान अल रहीम रहमत के मादह से यह अल्लाह के रहमत से यह दो असमा हैं। इन दोनो में फर्क क्या है? रहमान फालान के वजन पर मुबालगे का सीगा है, चुनांचे इस के अंदर मुबालगे की कैफियत है, यानि इंतहाई रहम करने वाला । इस लिए के अरब जो इस वजन पर कोई लफ्ज़ लाते हैं तो मालूम होता है इस में नेहायत शिद्दत है।

और रहीम फाईल के वजन पर सिफत मुशब्बेह है। जब कोई सिफत किसी की जात में मुस्तकिल दाएम हो जाए तो वह फाईल के वजन पर आती है। अल रहमान रहीम दोनो सिफात इकट्ठी होने का मानी यह है के उस की रहमत ठाठे मारते होए समंदर के मानिंद है , और उस की रहमत में दवाम भी है वह एक दरिया की तरह रवां दवां है। अल्लाह ताला की रहमत की यह दोनो शाने ब एक समय मौजूद है। 

 

सुर: फातिहा तफसीर इब्न कसीर الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ 

  الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ 

जो बड़े मेहरबान, निहायत रहम वाले हैं। (2) 

इसकी तफ्सीर पहले पूरी गुज़र चुकी है, अब उसको दोबारा बयान करने की ज़रूरत नहीं। कुर्तुबी रह. 

 

फरमाते हैं कि ‘रब्बिल-आलमीन’ के वस्फ (सिफ्त और खूबी) के बाद ‘अर्रहमानिर्रहीम’ का वस्फ ‘तरहीब’ यानी डरावे के बाद ‘तरगीब’ यानी उम्मीद दिलाना है। जैसे फरमायाः

نَبِي عِبَادِي أَنِّي أَنَا الْغَفُورُ الرَّحِيمُ، وَأَنَّ عَذَابِي هُوَ الْعَذَابُ الْأَلِيمُ. यानी मेरे बन्दों को ख़बर कर दो कि मैं बख़्शने वाला मेहरबान भी हूँ और मेरे अज़ाब भी दर्दनाक 

 

अज़ाब हैं। 

 

और फरमाया तेरा रब जल्द सज़ा करने वाला और मेहरबानी और बख्रिशश भी करने वाला है। रब के लफ़्ज़ में ‘तखवीफ’ (डरावा) है और ‘रहमान’ व ‘रहीम’ के लफ़्ज़ में उम्मीद है। सही मुस्लिम शरीफ में हज़रत अबू हुरैरह रज़ि. की रिवायत से नक्ल किया गया है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ■ फरमाया- अगर ईमान वाला खुदा के ग़ज़ब व गुस्से से और उसके सख्त अज़ाबों से पूरा वाकिफ होता (तो ■ उस वक़्त) उसके दिल से जन्नत की उम्मीद हट जाती, और अगर काफिर अल्लाह तआला की नेमतों और उसकी रहमतों को पूरी तरह जान लेता तो कभी नाउम्मीद

न होता।

 

 

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